भगवान विष्णु के अवतार आदिराज पृथु-Adiraj Prithu

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भगवान विष्णु के अवतार आदिराज पृथु 
(Bhagwan Vishnu Ke Avatar Adiraj Prithu)

शुकदेव जी से महाराज परीक्षित् ने पूछा-भगवन् प्रभु नारायण ने महाराज पृथु के रूप में अवतार धारण कर क्या-क्या लीलायें कीं उन सबका चरित्र मुझे श्रवण कराइये? भगवान् श्री कृष्ण के अनन्य भक्त श्री शुकदेव जी कहने लगे।  राजन् शांतचित्त, आसक्तिशून्य और समदर्शी पुत्र उत्कल ने अपने पिता ध्रुव के सार्वभौम वैभव और राज्य सिंहासन को अस्वीकार कर दिया तब मंत्रियों ने भूमि पुत्र वत्सर छोटे भाई को राजा बनाया। इसी वंश में उल्मुक ने अपनी पत्नी पुष्करिणी से अंग सहित छः पुत्रों को उत्पन्न किया। महाराज अंग शील संपन्न, साधु स्वभाव, ब्राह्मण भक्त और महात्मा थे। 

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एक बार राजर्षि अंग ने अश्वमेध महायज्ञ का अनुष्ठान किया। उसमें वेदवादी ब्राह्मणों के आह्नान करने पर भी देवता अपना भाग लेने नहीं आये यह बात विस्मित होकर ऋत्विजों ने यजमान अंग से बतायी। ऋत्विजों की बात सुनकर यजमान बहुत उदास हुए और उन्होंने ऋत्विजों से विनम्र वाणी में पूछा- हे सदस्यों! आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है, जो देवता लोग आह्नान करने पर भी यज्ञ में नहीं आ रहे हैं? सदस्यों ने कहा - राजन् इस जन्म में तो आपसे तनिक भी अपराध नहीं हुआ है, हां पूर्वजन्म का एक अपराध अवश्य है, जिसके कारण आप सर्वगुण संपन्न होने पर भी पुत्रहीन हैं। आपका मंगल हो। इसलिए पहले आप पुत्रेष्टि यज्ञ करावें। यज्ञ प्रारंभ हुआ और अग्निकुंड से सोने के हार व शुभ वस्त्रों से विभूषित स्वर्णपात्र में खीर लिए हुए एक पुरूष प्रगट हुए। 

उदार हृदय राजा अंग ने याज्ञकों की आज्ञा से अपनी अंजलि में वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूंघकर आनंदपूर्वक अपनी पत्नी को दे दिया। समय आने पर उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। वह बालक अधर्म के वंश में उत्पन्न हुए अपने नाना मृत्यु का अनुगामी था। सुनीथा मृत्यु की ही बेटी थी इसलिए वह बेटा ‘वेन’ भी अधार्मिक ही हुआ। महाराज अंग वेन के पाप कर्मों से दुखी होकर, आसक्ति का परित्याग कर चुपचाप उस महान् ऐश्वर्य संपन्न राजमहल से निकलकर वन को चले गए। शास्त्र कहता है जो वन गया बन गया। राम, कृष्ण, बुद्ध, मीरा आदि-आदि वन गए तो बन गए। परिवारी जनों, मंत्री और पुरोहितों आदि ने खूब खोज की परंतु महाराज अंग का पता न चला। तब माता सुनीथा के सम्मति से वेन को भूमंडल के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया। 

राज्यासन उन्मत्त हो गया और अभिमान वश अपने को ही सबसे बड़ा मानकर महापुरूषों का अपमान करने लगा। श्री शुकदेव जी कहते हैं - राजन् वेन ने राज्य में होने वाले समस्त धर्म-कर्म बंद करा दिए और कहा हे ब्राह्मण! तुम मत्सरता छोड़कर अपने सभी कर्मों द्वारा मेरा ही पूजन करो और मुझी को बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजा का अधिकारी हो सकता है। इस प्रकार विपरीत बुद्धि होने के कारण कुमार्ग गामी हो गया। मुनियों के विनय पूर्वक प्रार्थना करने पर भी व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया तब भगवान् की निंदा करने के कारण पहले से ही मृत अवस्था को प्राप्त वेन को मुनियों ने हुंकारों से ही मार दिया। मुनिगण अपने-अपने आश्रमों को लौट गये। राज्य में अराजकता फैल गयी। 

तब ऋषियों ने माता सुनीथा के द्वारा रक्षित वेन के शरीर को मंगवाकर उसकी जांघ का बड़ी जोर से मंथन करने लगे तो उसमें से एक कौए के समान काले वर्ण का बौना पुरुष उत्पन्न हुआ। बड़ी दीनता और नम्रभाव से उसने ऋषियों से पूछा कि मैं क्या करूँ? तो ऋषियों ने कहा - ‘निषीद’ (बैठ जा)। इसी से वह निषाद कहलाया और वेन के संपूर्ण पापों को अपने ऊपर ले लिया और तभी से उसके वंशधर नैषाद हिंसा, लूट-पाट आदि पाप कर्मों में रत रहने के कारण वन और पर्वतों में ही निवास करते हैं। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! इसके बाद ब्राह्मणों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया तब उनसे एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। यह पुरूष भगवान विष्णु की विश्वपालनी कला से प्रकट हुआ है

ऋषियों ने कहा यह स्त्री उस परम पुरुष की शक्ति लक्ष्मीजी का अवतार है। अपनी सुकीर्ति का प्रथन-विस्तार करने के कारण यह यशस्वी पुरूष ‘पृथु’ नामक सम्राट होगा। और इस सर्वशुभ-लक्षण संपन्न परम सुंदरी का नाम ‘अर्चि’ होगा यह सम्राट पृथु की धर्मपत्नी होगी। पृथृ के दाहिने हाथ में चक्र और चरणों में कमल का चिह्न देखकर ऋषियों ने बताया- पृथु के वेष में स्वयं श्री हरि का अंश अवतरित हुआ है और प्रभु की नित्य सहचरी लक्ष्मीजी ने ही अर्चि के रूप में धरती पर पदार्पण किया है। ‘महात्माओं! धर्म और अर्थ का दर्शन कराने वाली अत्यंत सूक्ष्म बुद्धि मुझे स्वतः प्राप्त हो गयी है।’ इंद्र के समान तेजस्वी नरश्रेष्ठ पृथु ने कवच धारण कर रखा था। उनकी कमर में तलवार बंधी थी। वे धनुष-बाण लिए हुए थे। उन्हें वेद-वेदांगों का पूर्ण ज्ञान था। उन्होंने हाथ जोड़कर ऋषियों से कहा- मुझे इस बुद्धि के द्वारा आप लोगों की कौन सी सेवा करनी है? आप लोग आज्ञा प्रदान करें। मैं उसे अवश्य पूरा करूंगा।’ तब वहां देवताओं और महर्षियों ने उनसे कहा- वेननन्दन! जिस कार्य में निश्चित रूप से धर्म की सिद्धि होती है, उसे निर्भय होकर करो। 

प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मान को दूर हटाकर समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखो। लोक में जो कोई भी मनुष्य धर्म से विचलित हो, उसे सनातन धर्म पर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबल से परास्त करके दंड दो। साथ ही यह भी प्रतिज्ञा करो कि मैं मन, वाणी और क्रिया द्वारा भूतलवर्ती ब्रह्म (वेद) का निरंतर पालन करूंगा वेद धर्म का पालन करूंगा। कभी स्वच्छन्द नहीं होऊंगा।’ परंतप प्रभो ! यह भी प्रतिज्ञा करो कि ब्राह्मण मेरे लिए अदंडनीय होंगे तथा मैं संपूर्ण जगत् को वर्ण संकरता और धर्म संकरता से बचाऊंगा।’ आदि सम्राट महाराज पृथु ने अत्यंत विनम्र वाणी में ऋषियों के आज्ञापालन का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हुए कहा- महाभाग ब्राह्मण मेरे लिए सदा वन्दनीय होंगे। महाराज पृथु के दृढ़ आश्वासन से ऋषिगण अत्यंत प्रसन्न हुए। वेदवादी ब्राह्मणों ने महाराज पृथु के दृढ़ आश्वासन से संतुष्ट होकर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत महाराज का विधिवत राज्याभिषेक कर दिया।

उस समय शोभा की खान महारानी अर्चि के साथ राज्यसिंहासन पर विराजमान महाराज पृथु की अद्भुत शोभा हो रही थी। उस समय वे दूसरे अग्निदेव के सदृश जान पड़ते थे। उस सभा में पधारे हुए कुबेर ने स्वर्ण सिंहासन, वरुण ने चंद्रमा के समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र, वायु ने दो चंवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, इंद्र ने मनोहर मुकुट, यम ने दमन करने वाला दंड, ब्रह्मा ने वेदमय कवच, सरस्वती ने सुंदर हार, विष्णुभगवान् ने सुदर्शन चक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजी ने अविचल संपत्ति, रूद्र ने दस चंद्राकार चिह्नों से युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजी ने सौ चंद्राकार चिह्नों वाली ढाल, चंद्रमा ने अमृतमय अश्व, विश्वकर्मा ने सुंदर रथ, आकाशविहारी सिद्ध गंधर्वादि ने नाचने-गाने, बजाने और अंतर्धान हो जाने की शक्तियों तथा ऋषियों ने अमोघ आशीर्वाद तथा नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग तथा सभी प्राणियों व अन्य देवताओं ने भी महाराज पृथु को बहुमूल्य उपहार दिए। 

श्री शुकदेव जी कहते हैं- राजन्! इसके अनन्तर भविष्यद्रष्टा ऋषियों की प्रेरणा से वंदीजनों ने महाराज पृथु के भावी पराक्रमों का वर्णन कर उनकी स्तुति की। महाराज पृथु ने वन्दीजनों की प्रशंसा करते हुए उन्हें तथा ब्राह्मणादि चारों वर्णों, सेवकों, मंत्रियों, पुरोहितों, पुरवासियों, देशवासियों तथा विभिन्न व्यवसायियों आदि का भी यथोचित सत्कार किया। सिंहासनारूढ़ महाराज पृथु के समक्ष उपस्थित होकर भूख से जर्जर, अत्यंत कृशकाय प्रजाजनों ने आकर प्रार्थना की कि हे महाराज! हम पेट की भीषण ज्वाला से जल रहे हैं। आप हमारे अन्नदाता हैं। आप अन्न की शीघ्र व्यवस्था कर हमारे प्राणों को बचा लें। प्राणप्रिय प्रजा के आर्तनाद से व्याकुल हो आदि सम्राट महाराज ने विचार किया कि पृथ्वी ने ही वेन के पापाचरण से त्रसित होकर अन्न व औषधियों को निश्चय ही अपने भीतर छिपा लिया है। 

यह विचार कर ही महाराज पृथु अपना ‘आजगव’ नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर अत्यंत क्रोधपूर्वक पृथ्वी के पीछे दौड़े। पृथ्वी ऐसे रूप में महाराज को देखकर कांपती हुई भयभीत मृगी की भांति गौ रूप धारण कर दिशा-विदिशा, धरती-आकाश सभी जगह गयी, किंतु सर्वत्र उसने धनुष की प्रत्यंचा पर अपना तीक्ष्ण शर चढ़ाये क्रुद्ध सम्राट पृथु को ही देखा। तब असहाय प्राण रक्षार्थ पृथ्वी ने महाराज पृथु से कहा-महाराज मुझे मारने पर आपको स्त्री-वध का पाप लगेगा। कुपित पृथु ने कहा- ‘‘जहां एक दुष्ट के वध से बहुतों की विपत्ति टल जाती हो, सब सुखी होते हों, उसे मार डालना ही पुण्यप्रद है।’’ ‘नृपोत्तम! पृथ्वी बोली-‘मुझे मार देने पर आपकी प्रजा का आधार ही नष्ट हो जायेगा।’ प्रतापी महाराज प्रभु ने उत्तर दिया- वसुधे! अपनी आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण मैं तुझे मार ही डालूंगा, फिर मैं अपने योगबल से प्रजा को धारण करूंगा।’

धरणी ने महाराज पृथु के चरणों में प्रणामकर उनकी स्तुति की। फिर उसने कहा-पापात्माओं के द्वारा दुरूपयोग किये जाते देखकर मैंने बीजों को अपने उदर में ही रोक लिया था। आप प्रजा हित के लिए ऐसा बछड़ा प्रस्तुत करें, जिससे वात्सल्यवश मैं उन्हें दुग्ध रूप से निकाल सकूं। एक बात और है, आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा ऋतु बीत जाने पर भी मेरे ऊपर इंद्र का बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे, मेरे भीतर की आर्द्रता सूखने न पाये। पृथ्वी के कहे हुए ये प्रिय और हितकारी वचन स्वीकार कर महाराज पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बना अपने हाथ रूपी पात्र में ही समस्त धान्यों को दुह लिया तथा ऋषियों, देवताओं, दैत्य-दानवों, गंधर्व-अप्सराओं, महाभाग पितृगण, सिद्धों, मायावियों, यक्ष-राक्षस आदि-आदि विज्ञजनों ने भी अपने-अपने योग्य वस्तुओं के सुयोग्य बछड़ा व पात्रों की व्यवस्था कर दोहन कर लिया। 

पृथ्वी के द्वारा सब कुछ प्रदान करने पर स्नेहवश उन्होंने सर्वकामदुधा पृथ्वी को अपनी कन्या के रूप में स्वीकार कर लिया। महाराज पृथु ने पृथ्वी को समतल भी कर दिया। पुर और ग्राम का विश्राम कर दिया। पृथ्वी द्वारा विष्णु के अंशावतार श्री पृथु के शासन में इच्छित वस्तुएं स्वयं ही प्राप्त हो जाती थीं। सम्राट पृथु अत्यंत धर्मात्मा तथा परम भगवद् भक्त थे। सांसारिक कामनाएं उनका स्पर्श तक नहीं कर सकी थीं। उन्होंने प्रभु को संतुष्ट करने के लिए महाराज मनु के ब्रह्मावर्त क्षेत्र में जहां सरस्वती नदी पूर्वमुखी होकर बहती है, सौ अश्वमेध-यज्ञों की दीक्षा ली। श्री हरि की कृपा से उस यज्ञानुष्ठान से पृथु का बड़ा उत्कर्ष हुआ, किंतु यह बात देवराज इंद्र को प्रिय नहीं लगी। जब महाराज पृथु अंतिम यज्ञ द्वारा यज्ञपति श्रीभगवान् की आराधना कर रहे थे, इंद्र ने यज्ञ का अश्व चुरा लिया।

पाखंड से अनेक प्रकार के वेष बनाकर वे अश्व की चोरी करते और महर्षि अत्रि की आज्ञा से पृथु के महारथी पुत्र विजिताश्व उनसे अश्व छीन लाते। जब इंद्र की दुष्टता का ज्ञान महाराज पृथु को चला, तब वे कुपित होकर इंद्र को दंड देने के लिए धनुष पर तीक्ष्ण बाण का संधान करने के लिए तैयार हो गए। ऋत्विजों ने असह्य पराक्रम महाराज पृथु को रोकते हुए कहा- राजन् ! इस यज्ञ में उपद्रव करने वाला आपका शत्रु इंद्र आपकी सुकीर्ति से ही निस्तेज हो रहा है। हम अमोघ आवाहन मंत्रों के द्वारा उसे अग्नि में हवन कर भस्म कर देते हैं। महाराज पृथु से परामर्श कर याजकों ने क्रोधपूर्वक इंद्र का आवाहन किया। वे आहुति देना ही चाहते थे कि चतुर्मुखी ब्रह्माजी ने उपस्थित होकर रोक दिया। 

विधाता ने आदि सम्राट महाराज पृथु से कहा- राजन् यज्ञ संज्ञक इंद्र तो श्रीमद्भगवान् की ही मूर्ति हैं। आप तो श्रीहरि के अनन्य भक्त हैं। आपको इंद्र पर क्रोध नहीं करना चाहिए। आप यज्ञ बंद कर दीजिए।’ श्री ब्रह्माजी के वचनों का पालन करते हुए यज्ञ की वहीं पूर्णाहुति कर दी। उनकी सहिष्णुता, विनय एवं निष्काम भक्ति से भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गए। भक्त वत्सल श्री हरि इंद्र के साथ वहां उपस्थित हो गए। पृथु महाराज ने इंद्र को क्षमा कर दिया। प्रभु ने कहा - राजन् । तुम्हारे गुणों और स्वभाव ने मुझको वश में कर लिया है, अतः इच्छित वरदान मांग लो। भगवन्! ‘‘मुझे तो केवल दस हजार कान दे दीजिए, जिनसे मैं आपके लीला गुणों को ही सुनता रहूं, सुनता ही रहूं यह वरदान सम्राट पृथु ने मांग लिया।’’ परंतु भगवान ने दो कानों में ही दस हजार कान की शक्ति दे दी। 

‘तुम्हारी अनुरक्ति मुझमें बनी रहे! इस प्रकार वरदान देकर महाराज पृथु द्वारा पूजित श्रीभगवान् व अन्य देवगण अपने-अपने धाम पधारे। महाराज पृथु ने गंगा-यमुना के मध्यवर्ती क्षेत्र प्रयागराज को अपनी निवास भूमि बनाकर अनासक्त भाव से प्रजा का पालन करते थे। अपनी प्रजा को हितकारी उपदेश दिया तथा महाराज पृथु को सनकादिकों का उपदेश प्राप्त हुआ। पृथु महाराज ने कहा-दीनदयाल श्री हरि ने मुझ पर पहले कृपा की थी, उसी को पूर्ण करने के लिए आपने मुझे आत्मतत्व का उपदेश देकर कृतज्ञ कर दिया। आदिराज पृथु ने आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ सनकादि की पूजा की और वे भी उनके शील की प्रशंसा करते हुए आकाशमार्ग से चले गए। राज्यभार को पुत्रों पर सौंप पत्नी सहित तपोवन में जाकर श्रीहरि की आराधना करते हुए ज्ञान और वैराग्य के प्रभाव से अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूप में स्थित होकर जीव की उपाधि को त्यागकर ब्रह्मलीन हो गए। महारानी अर्चि भी पति लोक को प्राप्त हो गयीं।

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