आज भी तपस्या में लीन चिरंजीवी परशुराम
भगवान परशुराम, विष्णु के छठे अवतार, त्रेता युग में जन्मे एक अमर (चिरंजीवी) ऋषि और योद्धा हैं। महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र परशुराम ने अन्यायकारी क्षत्रियों का 21 बार संहार कर समाज में धर्म की पुनः स्थापना की। भगवान परशुराम का मूल नाम राम था किन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम हो गया। भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शाङ्र्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पत: भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होनें कर्ण को श्राप भी दिया था। भगवान परशुराम श्री हरि विष्णु के अंशावतार है और आठ मुख्य चिरंजिवियो में से एक है द्य आज भी वे जीवित है और इस कलियुग के अंत में जब भगवान विष्णु कल्कि अवतार लेंगे तब भगवान परशुराम ही उनके गुरु बनकर उन्हें शिक्षा प्रदान करेंगे, अक्षय तृतीया पर इनका जन्मोत्सव बनाया जाता है।
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