इस व्रत से भगवान विष्णु हर मनोकामना पूर्ण करते है- Bhagwan Vishnu fulfills every wish with this fast

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दीपक  1, घी  250 ग्राम, धूप-1 पैकैट, हल्दी  1.25 किलो, हल्दी पाउडर- 1 पैकैट. कपूर  1 पैकेट, सिंदूर- 1 पैकैट, बेसन के लड्डु  1.25 किलो, मुन्नका (किशमिश) -25ग्राम, कलश  1, आम के पत्ते, सुपारी,  श्रीफल, पीला वस्त्र, केला  in hindi, धन, विद्या, स्वास्थ्य, संतान प्राप्ति का आर्शीवाद मिलता है in hindi,  Dhan, vidya, swasthy, santan prapti ka aarshirvaad milta hai in hindi, वीरवार को भगवान बृहस्पति की पूजा से धन, विद्या, संतान इत्यादि मनोकामना पूर्ण होती है in hindi, परिवार में सुख-समृद्धि के साथ जिन व्यक्तियों का विवाह योग में अड़चनें आ रही है उन्हें वीरवार का व्रत करना चाहिए in hindi,  इससे शीघ्र ही विवाह का योग बनता है in hindi,  वीरवार के दिन पीले वस्त्र धारण करके पीले पुष्प, चने की दाल, मक्के का आटा, हल्दी, पीले कपड़े, केले इत्यादि भगवान बृहस्पति in hindi, केले के पेड़ को तिलक करके उसमें अर्पित करें in hindi,  इसके बाद भगवान बृहस्पति की कथा का गुणगान कीजिये in hindi, ब्राहमण, गुरु, पुरोहित या गरीब को दान में चीनी, केला, केशर, मिठाईयां, हल्दी देवें in hindi, बृहस्पति के दिन भगवान विष्णु 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  Bhagwan Vishnu fulfills every wish with this fast 
इस व्रत से भगवान विष्णु हर मनोकामना पूर्ण करते है
  • गुरुवार को भगवान बृहस्पति की पूजा का विधान है इस दिन पूजा से समस्त परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और शीघ्र विवाह-संयोग के लिए भी गुरुवार का व्रत किया जाता है। गुरुवार का व्रत बहुत लाभदायी होता है इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन  बृहस्पतिदेव और केले के पेड़ की पूजा की जाती है। बृहस्पतिदेव को बुद्धि का दाता माना जाता है।
समस्त समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए

गुरुवार व्रत की कथा
  • एक बड़ा प्रतापी और दानी राजा राज करता था। वह प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता एवं भूखे और गरीबों को दान देकर पुण्य प्राप्त करता था। लेकिन यह बात उसकी रानी को अच्छी नही लगती थी। क्योंकि वह न तो व्रत करती थी और न ही किसी को एक भी पैसा दान में देती थी। वह राजा को भी ऐसा करने से मना करती थी। एक समय राजा शिकार खेलने के लिए वन चले गए थे।. घर पर रानी और दासी थी उसी समय गुरु बृहस्पतिदेव साधु का रूप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आए। साधु ने जब रानी से भिक्षा मांगी तो वह कहने लगी हे साधु महाराज मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूँ। कृपया आप कोई ऐसा उपाय बताये जिससे कि सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूँ। बृहस्पतिदेव ने कहा- हे देवी तुम बड़ी विचित्र हो। संतान और धन से कोई दुखी होता है अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ। कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचे का निर्माण कराओ, जिससे तुम्हें दोनों लोक का पुण्य प्राप्त हो। लेकिन साधु की इन बातों से रानी को खुशी नही हुई। उसने कहा कि मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नही है जिसे मैं दान दूँ और जिसे संभालने में मेरा सारा समय नष्ट हो जाए। तब साधु ने कहा- यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो मैं जैसा तुम्हें बताता हूँ तुम वैसा ही करना गुरुवार के दिन तुम घर को गोबर का लेप लगाना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस मदिरा खाना, कपड़ा धोने के लिए धोबी को देना। इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा समस्त धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर साधु अंतर्ध्यान हो गए। साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा, तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ। क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते है इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुखी रहने लगी। एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा। तो रानी ने अपनी दासी से कहा- हे दासी, पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है। वह बड़ी धनवान है तू उसके पास जा और कुछ लेकर आ। दासी रानी की बहन के पास गई उस दिन गुरुवार था और रानी की बहन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का संदेश दिया लेकिन रानी की बड़ी बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नही मिला तो वह बहुत दुखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा उधर रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आई थी, लेकिन मैं उससे नही बोली इससे वह बहुत दुखी हुई होगी। कथा समाप्त होने के बाद वह अपनी बहन के घर आई और कहने लगी- हे बहन, मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते है, इसलिए मैं नहीं बोली कहो दासी क्यों गई थी। रानी बोली- बहन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहन को विस्तारपूर्वक सूना दी। रानी की बहन बोली- देखो बहन, भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते है देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई दासी रानी से कहने लगी- हे रानी, जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पता कर ले, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा। उसकी बहन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहन अपने घर को लौट गई। सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुखी थे। लेकिन उन्होंने व्रत रखा था इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया। उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। तब दासी बोली- देखो रानी, तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है। रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पितृ-पक्ष प्रसन्न होंगे। दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा।