Shrimad Bhagwat Katha Saptah For Rajendra Prasad Dobhal

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श्रीमद् भागवत सप्ताह बैकुंठ धाम का रास्ता

स्वर्गीय श्री राजेन्द्र प्रसाद डोभाल, पुत्र स्व.श्री जीतराम डोभाल ग्राम मलाउ, जिला पौड़ी उत्तराखण्ड। चार भाईयों और एक बहन में सबसे बड़े थे। शिक्षा विभाग पौड़ी में वरिष्ठ अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए। अपने जीवन-काल में बड़े होने की जिम्मेदारी अच्छी तरह पूरी निभाई। इसका मुख्य श्रेय माता-पिता से प्राप्त संस्कार थे, जिनकी वजह से आज तक डोभाल परिवार एक संयुक्त परिवार की तरह अपनी जिम्मेदारी निभाता आ रहा है। श्रीमती गीता डोभाल धर्म पत्नी स्वर्गीय श्री राजेन्द्र प्रसाद डोभाल। पति के अस्कमात जाने का दुःख असहनीय था। एक समय था जब हम सब टूट गये थे। एक बार फिर उन संस्कारों से हमें शक्ति मिली। मन में एक बात थी कि उस पुण्य आत्म के लिए क्या सही है जो हम कर सकते है। मेरा परिवार ने पितृ-मोक्ष के लिए विधिवत् मासिक देने का संकल्प किया जो हमारे पूर्वजों की कृपा से पूरा हुआ।

पुण्य-आत्मा-शांति के लिए श्रीमद् भागवत सप्ताह का आयोजन श्रीमती गीता डोभाल अपने सुपुत्रों आशीष डोभाल, मनिश डोभाल और अपनी पुत्रियों श्रीमती अनुराधा बिन्जोला एवं अराधना भारद्वाज एवं डोभाल परिवार के सहयोग से दिनांक 15-4-2022 से 23-4-2022 को सम्पन्न हुआ। कहते हैं कि अनेक पुराणों और महाभारत की रचना के उपरान्त भी भगवान व्यास जी को परितोष नहीं हुआ। परम आह्लाद तो उनको श्रीमद् भागवत की रचना के पश्चात् ही हुआ भगवान श्रीकृष्ण इसके कुशल कर्णधार हैं, जो इस असार संसार सागर से सद्यः सुख-शांति पूर्वक पार करने के लिए सुदृढ़ नौका के समान हैं। यह श्रीमद् भागवत ग्रन्थ प्रेमाश्रुसक्ति नेत्र, गदगद कंठ, द्रवित चित्त एवं भाव समाधि निमग्न परम रसज्ञ श्रीशुकदेव जी के मुख से उद्गीत हुआ। सम्पूर्ण सिद्धांतो का निष्कर्ष यह ग्रन्थ जन्म व मृत्यु के भय का नाश कर देता है, भक्ति के प्रवाह को बढ़ाता है तथा भगवान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता का प्रधान साधन है। मन की शुद्धि के लिए श्रीमद् भगवत से बढ़कर कोई साधन नहीं है।

श्रीमद् भागवत कथा देवताओं को भी दुर्लभ है तभी परीक्षित जी की सभा में शुकदेव जी ने कथामृत के बदले में अमृत कलश नहीं लिया। ब्रह्मा जी ने सत्यलोक में तराजू बाँध कर जब सब साधनों, व्रत, यज्ञ, ध्यान, तप, मूर्तिपूजा आदि को तोला तो सभी साधन तोल में हल्के पड़ गए और अपने महत्व के कारण भागवत ही सबसे भारी रहा। जब श्री भगवान निज धाम को जाने के लिए उद्यत हुए तो सभी भक्त गणों ने प्रार्थना कि- हम आपके बिना कैसे रहेंगे तब श्री भगवान ने कहा कि वे श्रीमद् भगवत में समाए हैं। यह ग्रन्थ शाश्वत उन्हीं का स्वरुप है।

स्वर्गीय श्री राजेन्द्र प्रसाद डोभाल जी की पुण्य-आत्मा-शांति के लिए श्रीमद् भागवत् सप्ताह का आयोजन श्रीमती गीता डोभाल द्वारा पौड़ी उत्तराखंड में किया गया।

सौनक जी यह श्रीमद् भागवत की कथा देवताओं के लिए भी दुर्लभ है जब श्री सुखदेव जी ने देवताओं की हंसी उड़ा दी तो देवता मुंह लटका कर ब्रह्मा जी के पास आए तथा पृथ्वी में जो घटना हुई थी वह सब ब्रह्माजी से कह सुनाएं ब्रह्मा जी ने कहा देवताओं दुखी मत हो 7 दिन के पश्चात देखते हैं राजा परीक्षित की क्या गति होती है और 7 दिन के पश्चात जब राजा परीक्षित को मोक्ष को देखा तो ब्रह्मा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने सत्यलोक में एक तराजू बांधा उसमें एक तरफ संपूर्ण साधनों को रखा और दूसरी तरफ श्रीमद्भागवत को रखा भागवत जी की महिमा के सामने समस्त साधन हल्के पड़ गए। 

श्रीमद्भागवत कथा पितृ मोक्ष 

श्रीमदभागवत् कथा के प्रथम स्कन्ध के द्वितीय अध्याय की कथा 

उस समय समस्त ऋषियों ने माना इस भागवत को पढ़ने से श्रवण से वैकुंठ की प्राप्ति निश्चित होती है। यह श्रीमद् भागवत की कथा देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से सुनी परंतु साप्ताहिक कथा उन्होंने सनकादि ऋषियों से सुनी। शौनक जी ने कहा देवर्षि नारद तो एक ही स्थान पर अधिक देर ठहर नहीं सकते फिर उन्होंने किसी स्थान पर और किस कारण से इस कथा को सुना श्री सूतजी कहते हैं।  एक बार विशालापुरी बद्रिका आश्रम में सत्संग के लिए सनकादि चारों ऋषि आए।  वहां उन्होंने नारद जी को आते हुए देखा तो पूछा मुनिस्वरों में पृथ्वी लोक को उत्तम मान वहां पुष्कर प्रयाग काशी गोदावरी हरिद्वार कुरुक्षेत्र श्रीरंग और सेतुबंध रामेश्वर आदि तीर्थों में भ्रमण करता रहा। परंतु मन को संतोष प्रदान करने वाली शांति मुझे कहीं नहीं मिली अधर्म के मित्र कलयुग में समस्त पृथ्वी को पीड़ित कर रखा है। सत्य तपस्या पवित्रता दया दान कहीं भी दिखाई नहीं देता सभी प्राणी अपने पेट भरने में लगे हुए हैं।

घर में स्त्रियों की प्रभुता चलती है साले सलाहकार बन गए हैं पति-पत्नी में झगड़ा मचा रहता है इस प्रकार से कलयुग के दोषों को देखता हुआ यमुना के तट श्री धाम वृंदावन में पहुंचा जहां भगवान श्री कृष्ण की लीला स्थली है वहां मैंने एक आश्चर्य देखा वह एक युवती स्त्री खिन्न मन से बैठी हुई थी उसके समीप में दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्था में पड़े जोर जोर से सांस ले रहे थे वह युवती उन्हें जगाने का प्रयास करती जब वह नहीं जागते तो वह रोने लगती सैकड़ों स्त्रियों उसे पंखा कर रही थी और बारंबार समझा रही थी यह आश्चर्य दूर से देख मैं पास में चला गया मुझे देखते ही वह युवती स्त्री खड़ी हो गई और कहने लगी 

हे महात्मन कुछ देर ठहर जाइए और मेरी चिंता को नाश कीजिए मैंने कहा देवी आप कौन हैं यह दोनों पुरुष और यह स्त्रियां कौन हैं तथा अपने दुख का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए उस युवती ने कहा देवर्षि में भक्ति हूं और यह दोनों ज्ञान वैराग्य मेरे पुत्र हैं काल के प्रभाव से यह वृद्ध हो गए हैं और यह सब गंगा आदि नदियां मेरी सेवा के लिए यहां आई है। मैं दक्षिण में उत्पन्न हुई तथा कर्नाटक में वृद्धि को प्राप्त हुई कहीं-कहीं महाराष्ट्र में सम्मानित हुई और गुजरात में जाकर जीर्णता को प्राप्त हो गई वहां घोर कलिकाल के कारण पाखंडियों ने मुझे अंग भंग कर दिया और वृंदावन को प्राप्त करके पुनः में युवती हो गई परंतु मेरे पुत्र अभी भी वैसे ही थके-मांदे पड़े हुए हैं इसलिए अब मैं इस स्थान को छोड़कर अन्यत्र जाना चाहती हूं देवर्षि नारद ने कहा देवी यह दारुण कलयुग है जिसके कारण सदाचार योग मार्ग और तपस्या लुप्त हो गए हैं इस समय संत सत्पुरुष दुखी है और दुष्ट प्रशन्न है इस समय जिसका धैर्य बना रहे वही ज्ञानी है।

इस वृंदावन को प्राप्त करके आज पुनः आप युवती हो गई यह वृंदावन धन्य है जहां भक्ति महारानी नृत्य करती हैं भक्ति देवी कहती हैं देवर्षि यदि यह कलयुग ही अपवित्र है तो राजा परीक्षित ने इसे क्यों स्थापित किया और करुणा परायण भगवान श्रीहरि भी इस अधर्म को होते हुए कैसे देख रहे हैं देवर्षि नारद ने कहा देवी जिस दिन भगवान श्री कृष्ण इस लोक को छोड़कर अपने धाम में गए उसी समय साधनों में बाधा पहुंचाने वाला कलयुग आ गया दिग्विजय के समय राजा परीक्षित की दृष्टि जब इस पर पड़ी तो कलजुग दीन के समान उनकी शरण में आ गया भ्रमर के समान सार ग्राही राजा परीक्षित ने देखा जो फल अन्य युगों में तपस्या योग समाधि के द्वारा नहीं प्राप्त होता था वह फल कलयुग में मात्र भगवान श्रीहरि के कीर्तन से प्राप्त हो जाता है इस एक गुण के कारण राजा परीक्षित ने कलयुग को स्थापित किया देवी इस कलिकाल के कारण पृथ्वी के संपूर्ण पदार्थ बीज हीन भूसी के समान व्यर्थ हो गए हैं धन के लोग के कारण कथा का सार चला गया।

यह युगधर्म ही है इसमें किसी का कोई दोष नहीं देवर्षि नारद की इन वचनों को सुनकर भक्ति महारानी को बहुत आश्चर्य हुआ उन्होंने कहा देवर्षि आप धन्य हैं तथा मेरे भाग्य से ही आपका यहां आना हुआ साधुओं का दर्शन इस लोक में समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला है जिन आपके एकमात्र उपदेश को धारण करके कयाधु नंदन प्रहलाद ने माया पर विजय प्राप्त कर ली और जिन आपकी कृपा से ध्रुव ने ध्रुव पद को प्राप्त कर लिया ऐसे ब्रह्मा जी के पुत्र देवर्षि नारद को मैं प्रणाम करती हूं देवर्षि नारद कहते हैं देवी आप भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों का स्मरण करो आपका दुख दूर हो जाएगा जिन भगवान श्री कृष्ण ने कौरवों के अत्याचार से द्रोपती की रक्षा की वे श्री कृष्ण कहीं गए नहीं हैं और आपको तो वह प्राणों से भी ज्यादा स्नेह करते हैं तुम्हारे बुलाने पर तो वह नीचे के घर भी चले जाते हैं देवर्षि नारद ने जब इस प्रकार भक्ति की महिमा का वर्णन किया तो भक्ति महारानी ने कहा देवर्षि आपने क्षण भर में मेरा दुख दूर कर दिया अब ऐसा प्रयास कीजिए कि मेरे पुत्रों का दुख भी दूर हो जाए और उन्हें चेतना प्राप्त हो जाए भक्ति महारानी के इस प्रकार कहने पर देवर्षि नारद ज्ञान बैराग को हिला डुला कर उठाने का प्रयास किया परंतु जब भी नहीं उठे तो उनका नाम पुकारने लगे इतने पर भी नहीं जागे तो वेद वेदांत का घोष और गीता का पाठ करने लगे इससे वे जैसे-तैसे जागे तो परंतु जभांई लेकर पुनः सो गई यह देख देवर्षि नारद चिंतित हो गए और गोविंद का चिंतन करने लगे उसी समय आकाशवाणी हुई।

भगवान विष्णु के अवतार- Bhagwan Vishnu ke Avatar

देवर्षि तुम्हारा उद्योग सफल होगा इसमें कोई संदेह नहीं है इसके लिए तुम सत्कर्म करो और वह सतकर्म  तुम्हें साधु पुरुष बताएंगे आकाशवाणी को सुन देवर्षि नारद विचार करने लगे आकाशवाणी ने भी गुप्त रूप से वर्णन किया है वह कौन सा साधन है जिसके करने से ज्ञान बैराग की मूर्छा दूर हो जाए देवर्षि नारद ने ज्ञान बैराग को वहीं छोड़ और तीर्थों में जाकर संत-महात्माओं उसे पता करने के लिए चल पड़े संत महात्माओं ने नारद जी को आते हुए देखा तो अपनी अवज्ञा के डर से मौन धारण कर लिया कई सन्त तो आश्रम छोड़ कर भाग खड़े हुए जब कोई भी किसी एक निर्णय पर नहीं पहुंचा तो देवर्षि नारद ने तपस्या करने का विचार किया क्योंकि तपस्या करने के विचार से देवर्षि नारद बद्रिका आश्रम आए वहां उन्होंने सनकादि मुनिस्वरों को देखा तो उनके चरणों में प्रणाम किया और उनसे कहा मुनेश्वर आप दिखाई तो 5 वर्ष के लगते हो परंतु हो आप पूर्वजों के पूर्वज निरंतर हरि शरणम हरि शरणम इसका जप करते रहते हैं जिससे वृद्धावस्था आप को बाधित नहीं करती। भगवान श्रीहरि के द्वारपाल जय और विजय बैकुंठ से पृथ्वी में गिर पड़े थे और जिन आपकी ही कृपा से उन्होंने पुनः बैकुंठ को प्राप्त कर लिया हे मुनीश्वर ओ आकाशवाणी ने जिस साधन के विषय में कहा है वह कौन सा साधन है बताइए सनकादि मुनीश्वरों ने कहा देवर्षि प्रसन्न हो जाओ क्योंकि वह साधन बहुत सरल है और पहले से ही विद्यमान है।

वह है श्रीमद् भागवत की कथा जिसका गान सुकादि मुनीश्वर करते हैं इस श्रीमद्भागवत के द्वारा भक्ति ज्ञान वैराग्य तीनों को महान बल मिलेगा और ज्ञान बैराग दोनों का कष्ट दूर हो जाएगा देवर्षि नारद ने कहा मुनेश्वर जब वेद वेदांत की और गीता पाठ से ज्ञान वैराग्य की मूर्छा दूर नहीं हुई तो वह श्रीमद् भागवत से कैसे जगेंगे क्योंकि भागवत के प्रत्येक श्लोक और पद में वेदों का अर्थ ही तो निहित तो है सनकादि मुनिश्वरों ने कहा देवर्षि जैसे वृक्ष में जड़ से लेकर सीखा पर्यंत रस विद्यमान है परंतु जो स्वाद फल से प्राप्त होता है वह स्वाद लता शिखा से नहीं प्राप्त हो सकता दुग्ध में घी विद्यमान है परंतु घी से जो पकवान बनाए जा सकते हैं वह दूध से नहीं बनाए जा सकते घी के द्वारा आहुति देंगे तो अग्नि और ज्यादा प्रज्वलित हो जाएगी और दुग्ध से देंगे तो अग्नि शांत हो जाएगी इसी प्रकार गन्ने के प्रत्येक पर्व में शर्करा विद्यमान है परंतु यदि खीर बनानी हो तो गन्ने का पर्व डालने से उसमें मिठास नहीं आएगी मिठास तो शर्करा डालने से ही आएगी।

यह जो श्रीमद् भागवत की कथा है यह वेदों का सार सर्वस्व है देवर्षि नारद ने कहा मुनिस्वरों मुझे भागवत की कथा कहां करनी चाहिए उसके लिए उपयुक्त स्थान बताइए सनकादि मुनिस्वरों  ने कहा गंगा द्वार हरिद्वार के समीप में आनंद नामक तट है वहां नवीन और कोमल बालुका के ऊपर मंच बनाओ और भागवत की कथा प्रारंभ करो देवर्षि नारद ने सनकादि मुनिस्वरों को वक्ता के रूप में वरण  किया और उन्हें अपने साथ ही हरिद्वार ले आए वह बड़ा सुंदर मंच बनाया व्यास गद्दी बनाई उसमें सनकादि मुनिस्वरों  को बिठाला सनकादि मुनीश्वरों ने  जैसे ही भगवान की भागवत कथा प्रारंभ की त्रिलोकी में हल्ला मच गया ब्रह्मा आदि सभी देवता भ्रगु वशिष्ठ  च्यवन  आदि ऋषि वेद वेदांत मंत्र यंत्र तंत्र 17 पुराण गंगा आदि नदियां और समस्त तीर्थ मूर्तिमान होकर कथा सुनने के लिए प्रकट हो गए क्योंकि जहां भगवान श्री हरि की कथा होती है वहां गंगा आदि नदियां समस्त तीर्थ है मूर्तिमान होकर प्रकट हो जाते हैं देवर्षि नारद ने सभी को आसन दिया तथा सभी जय जयकार करने लगे सनकादि मुनीश्वरों ने भागवत की महिमा का वर्णन प्रारंभ किया

बहुत से पुराण और शास्त्रों को सुनने से क्या प्रयोजन यह तो भ्रम उत्पन करने वाले हैं मुक्ति प्रदान करने के लिए एकमात्र भागवत शास्त्र ही गर्जना कर रहा है मृत्यु का समय निकट आने पर जो भागवत कथा को श्रवण करता है भगवान श्रीहरि उस पर प्रसन्न होकर उसे अपना बैकुंठ धाम दे देते हैं जो पुरुष स्वर्ण के सिंहासन पर श्रीमद् भागवत की पोथी को रख कर दान करता है उसे गोलोक धाम की प्राप्ति होती है। जिन्होंने अपने जीवन में मन लगाकर भागवत का श्रवण नहीं किया वह गधे के समान है उसने व्यर्थ में ही अपनी मां को प्रसव पीड़ा प्रदान कि वह जीते जी मुर्दे के समान है मनुष्य रूप में भार रूप पशु के समान है ऐसे मनुष्य को धिक्कार है ऐसे स्वर्ग लोक में इंद्रादि देवता कहा करते हैं सनकादि मुनीश्वर इस प्रकार भागवत की महिमा का वर्णन कर ही रहे थे कि उसी समय एक आश्चर्य हुआ। भक्ति महारानी तरुण अवस्था को प्राप्त हुई अपने दोनों पुत्रों को लेकर वहां प्रकट हो गई और श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा इसका कीर्तन करते हुए नृत्य करने लगी रिसियों ने सब उन्हें नृत्य करते हुए देखा तो कहने लगे यह कौन है और यह कैसे प्रकट हो गई सनकादि मुनिश्वर ने कहा रिसियों यह अभी-अभी कथा के अर्थ से प्रगट हुई है भक्ति महारानी ने कहा मुनिश्वर कलिकाल के प्रभाव से में जीर्ण नष्ट हो गई थी आपने कथा के रस से मुझे पुनः पुष्ट कर दिया।

जो मनुष्य सदा सर्वदा पाप करते रहते हैं दुराचारी हैं कुमार्गगामी है क्रोध की अग्नि में सदा जलते रहते हैं कुटिल है कामी है ऐसे लोग भी कलयुग में भागवत के सुनने से पवित्र हो जाते हैं देवर्षि से इस विषय में मैं तुम्हें एक इतिहास सुनाता हूं जिसके सुनने मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। सनत्कुमारजी ऐसा कह रहे थे कि भक्ति देवी प्रकट हो गयीं, ज्ञान और वैराग्य दोनों का बुढ़ापा दूर हो गया, सनत्कुमार बोले! भक्ति देवी आप आ गयी, तुम भक्तों के ह्रदय में वास करो, भक्ति प्रकट हो गयी भक्तों के ह्रदय में और जब कीर्तन होने लगा। प्रहलाद जी ताली बजाने लगे, उद्धवजी कांसा बजाने लगे, देवराज इंद्र मृदंग बजाते है, सनत्कुमारजी जै-जैकार ध्वनि लगा रहे है और जितने भी संतजन वहाँ है, सब नृत्य कर रहे है, भोलेनाथ से नहीं रहा गया, पार्वती के साथ नृत्य करने मे तन्मय हो गये।

व्यास नन्दन आदरणीय शुकदेवजी महाराज बीच-बीच में व्याख्या करने लगे, इतनी सुन्दर स्वर लहरी, इतना सुंदर कीर्तन हुआ कि मेरे प्रभु से रहा नहीं गया और भगवान् कीर्तन में प्रकट हो गयेऔर कहां मैं आप लोगों की कथा एवम् कीर्तन से बड़ा प्रसन्न हूँ, इसलिए कोई उत्तम वरदान माँगे, क्या चाहिये? भक्तों ने कहा प्रभु! यही वर दे दो, जब-जब आपका कीर्तन करें, तब-तब आपका दर्शन कर लिया करें, भगवान वर देकर चले गये, ज्ञान-वैराग्य का बुढापा मिट गया, भक्ति देवी के मन की कष्ट की निवृत्ति हुई, सूतजी ने ये प्रसंग शौनकादि ऋषियों को बता दिया, यही प्रसंग सनत्कुमारों ने नारदजी से कहा और यहीं प्रसंग श्री आदरणीय शुकदेवजी महाराज ने राजा परीक्षित से कहा। भागवत अमृत है, इसका जो पान करे उसका जीवन धन्य हो जाता है। 


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