बद्रीनाथ से भगवान शिव का संबंध - Badrinath Se Bhagwan Shiv Ka Sambandh

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बताया गया है कि मनुष्य को जीवन में कम से कम एक बार बद्रीनाथ के दर्शन जरूर करना चाहिए हिन्दी में, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब माँ गंगा धरती पर अवतरित हुई  हिन्दी में, यह बारह धाराओं में बंट गई हिन्दी में, इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई हिन्दी में, बद्रीनाथ की मान्यता शास्त्रों और पुराणों में बैकुण्ठ के समान है हिन्दी में, कहा जाता है एक बैकुण्ठ क्षीर सागर है हिन्दी में, जहाँ भगवान विष्णु निवास करते हैं हिन्दी में, और दूसरा बद्रीनाथ है जो धरती पर मौजूद है हिन्दी में, बदरीनाथ मंदिर बदरीनारायण मंदिर नाम से भी जाना जाता है हिन्दी में, यह अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। ऋषिकेश से यह 294 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है हिन्दी में, कहा जाता है कि बद्रीनाथ में भगवान शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी हिन्दी में, जिसे आज ब्रह्म कपाल के नाम से जाना जाता है हिन्दी में, ब्रह्मकपाल एक ऊँची शिला है हिन्दी में, जहाँ पर पितरों को तर्पण दिया जाता है हिन्दी में, मान्यता है कि इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था हिन्दी में, अलकनंदा में स्थित तप्त-कुंड चरणपादुका इसके बारे में कहा जाता है हिन्दी में, यहाँ पर भगवान विष्णु के पैरों के निशान है हिन्दी में, यहाँ पर शीत के कारण अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त कठिन होता है हिन्दी में, अलकनन्दा के दर्शन करके  यात्री तप्तकुण्ड में स्नान करते हैं हिन्दी में, और वनतुलसी की माला, चने की दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है हिन्दी में, पुराणों के द्वारा हर युग मे बद्रीनाथ में बड़ा परिवर्तन होता है हिन्दी में, सतयुग तक यहाँ पर हर व्यक्ति को भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन होते थे हिन्दी में, शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य जीवन में एक बार बद्रीनाथ के दर्शन अवश्य करने चाहिए हिन्दी में, बद्रीनाथ धाम दो पर्वतों के बीच में है हिन्दी में, इसे नर-नारायण भी पर्वत कहा जाता है हिन्दी में, कहते हैं यहाँ पर भगवान विष्णु के अंश नर-नारायण ने कठोर तपस्या की थी हिन्दी में, नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण हुए हिन्दी में, मान्यता है कि जब केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं हिन्दी में, उस समय मंदिर में एक दीपक जलता रहता है हिन्दी में, इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्व है हिन्दी में, मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाजे के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं हिन्दी में, भगवान विष्णु ने अपनी लीला द्वारा बद्रीनाथ अपनाया  हिन्दी में, बद्रीनाथ कथा का उल्लेख में पुराणों में मिलता है हिन्दी में, जिसमे भगवान विष्णु ने अपनी लीला द्वारा शिव और माता पार्वती के घर को अपना घर बना लिया हिन्दी में, जहाँ आज बद्रीनाथ का पवित्र मंदिर स्थित है हिन्दी में, वहां पहले भगवान शिव और माता पार्वती का घर होता था हिन्दी में, एक बार नारद मुनि वैकुंठ धाम में भगवान विष्णु से मिलने गए हिन्दी में, तब उन्होंने देखा की भगवान विष्णु शेष नाग की शैया में विश्राम कर रहे है हिन्दी में, उन्हें इस तरह लेटे देखकर नारद मुनि ने उन्हें नींद से जगाया हिन्दी में, और उनसे बोले-भगवन  आप सम्पूर्ण मानवता के लिए बुरे प्रतीक बनते जा रहे हो हिन्दी में, हर समय आप इसी तरह विश्राम में रहते हो हिन्दी में, माता लक्ष्मी सदैव आपकी सेवा में लगी रहती है हिन्दी में, आप आलस में रहते हो हिन्दी में, अगर आप इस तरह अपना समय व्यतीत करेंगे हिन्दी में, जगत के लिए आप अच्छे उदाहरण नहीं कहे जायेंगे हिन्दी में, नारद मुनि की बात सुनकर भगवान विष्णु अपने इस समाधान के लिए हिमालय आये हिन्दी में, तपस्या के लिए शांत एवं पवित्र स्थान ढूढ़ने लगे हिन्दी में, स्थान ढूढ़ते-ढूढ़ते हुए भगवान विष्णु की नजर बद्रीनाथ पर पड़ी हिन्दी में, यह स्थान देखकर उन्हें बहुत पसंद आया हिन्दी में, बद्रीनाथ वैसा ही स्थान था जैसा भगवान विष्णु को तपस्या के लिए चाहिए था हिन्दी में, तभी भगवान विष्णु को वहाँ पर एक कुटियाँ दिखाई दी हिन्दी में,  जब वे उस कुटिया के दरवाजे के समीप गए हिन्दी में, तो अंदर उन्होंने माता पार्वती और भगवान शिव को पाया हिन्दी में, भगवान विष्णु अपने मन में सोचने लगे की यह कुटिया तो भगवान शिव और माता पर्वती का घर है हिन्दी में,  यदि में इनके घर में घुसा तो बहुत ही भयानक होगा हिन्दी में, भगवान शिव का क्रोध बहुत ही भयानक होता है हिन्दी में, तभी भगवान विष्णु को एक विचार आया हिन्दी में, उन्होंने एक शिशु का रूप धारण कर लिया हिन्दी में, शिशु का रूप धारण कर वे भगवान शिव के घर के दरवाजे के आगे लेट गए हिन्दी में, तथा जोर-जोर से रोने लगे हिन्दी में, बच्चे की रोने की आवज सुनकर माता पार्वती के हृदय में माँ की ममता जाग गई हिन्दी में, उन्होंने उस बालक को अपने गोद में ले लिया हिन्दी में, तब भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा इस बालक को मत छुओ हिन्दी में, परन्तु माता पार्वती भगवान शिव की बात न मानी हिन्दी में, माता पार्वती कहने लगी की आप कितने निर्दयी हिन्दी में, आप इस छोटे से शिशु को बाहर इस तरह रोते-बिलखते कैसे देख सकते हो ? हिन्दी में, माता पार्वती शिशु को घर के भीतर ले आई और शिशु के सो जाने के बाद उसे घर में छोड़ माता पार्वती भगवान शिव के जैसे कुंड में स्नान करने चली गयी हिन्दी में, जब वे दोनों वापस घर लोटे तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था हिन्दी में, पार्वती आश्चर्यचकित रह गयी हिन्दी में, तब भगवान शिव उनसे कहा मैने तुम्हें कहा था हिन्दी में, इस बच्चे को मत उठाओ हिन्दी में, अब उसने अंदर से घर का दरवाजा बंद कर लिया है हिन्दी में, माता पार्वती भगवान शिव से बोली अब हम क्या करें? हिन्दी में, भगवान शिव के पास दो मार्ग थे हिन्दी में, पहला अपने सामने हर चीज को जला देना व दूसरा कही और चले जायें। हिन्दी में,भगवान शिव माता पार्वती से बोले चलो अब अन्य स्थान पर चलते है हिन्दी में, क्योकि में इस बालक का कुछ नहीं कर सकता हिन्दी में, यह तुम्हे प्रिय है हिन्दी में, तब भगवान शिव और माता पार्वती ने अपना घर छोड़ दिया हिन्दी में, तथा दूसरा स्थान ढूढ़ते हुए केदारनाथ पहुँच गये हिन्दी में, और उसे उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया हिन्दी में, तभी से बद्रीनाथ भगवान विष्णु के निवास स्थान के रूप में और केदारनाथ भगवान शिव के निवास स्थान के रूप में माना जाता है हिन्दी में, badrinath in hindi, badrinath ka mahatva in hindi, badrinath dham in indi, badrinath ji ki arti in hindi, bhagwan vishnu ne apnee leela dwara badrinath apnaya in hindi, badrinath se bhagwan shiv ka sambandh in hindi, badrinath-dham-hindi, badrinath ki katha in hindi, badrinath ki kahani in hindi, badrinath-baikunth-hindi,  baikunth dham in hindi,संक्षमबनों इन हिन्दी में, संक्षम बनों इन हिन्दी में, sakshambano in hindi, saksham bano in hindi, क्यों सक्षमबनो इन हिन्दी में, क्यों सक्षमबनो अच्छा लगता है इन हिन्दी में?, कैसे सक्षमबनो इन हिन्दी में? सक्षमबनो ब्रांड से कैसे संपर्क करें इन हिन्दी में, सक्षमबनो हिन्दी में, सक्षमबनो इन हिन्दी 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 धरती  का बैकुण्ठ  
बद्रीनाथ से भगवान शिव का संबंध
(Lord Shiva's relation with Badrinath) 
  • बद्रीनाथ मंदिर भारत के उत्तरांखण्ड राज्य के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है। ऋषिकेश से यह 294 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। बदरीनाथ की मूर्ति शालिग्राम  से बनी हुई चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। मान्यता है कि इस मूर्ति को देवताओं ने  कुण्ड से निकालकर स्थापित किया था। बद्रीनाथ चार धामों में से एक है इस धाम के बारे कहते है कि जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे बैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। इसलिए शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य को जीवन में कम से कम एक बार बद्रीनाथ के दर्शन जरूर करना चाहिए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब माँ गंगा धरती पर अवतरित हुई तो यह बारह धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई। बद्रीनाथ की मान्यता शास्त्रों और पुराणों में बैकुण्ठ के समान है। कहा जाता है एक बैकुण्ठ क्षीर सागर है जहाँ भगवान विष्णु निवास करते हैं और दूसरा बद्रीनाथ है जो धरती पर मौजूद है। बदरीनाथ मंदिर बदरीनारायण मंदिर नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि बद्रीनाथ में भगवान शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। जिसे आज ब्रह्म कपाल के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मकपाल एक ऊँची शिला है जहाँ पर पितरों को तर्पण दिया जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। अलकनंदा में स्थित तप्त-कुंड चरणपादुका इसके बारे में कहा जाता है यहाँ पर भगवान विष्णु के पैरों के निशान है। यहाँ पर शीत के कारण अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त कठिन होता है। अलकनन्दा के दर्शन करके यात्री तप्तकुण्ड में स्नान करते हैं और वनतुलसी की माला, चने की दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। पुराणों के द्वारा हर युग मे बद्रीनाथ में बड़ा परिवर्तन होता है। सतयुग तक यहाँ पर हर व्यक्ति को भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन होते थे इसलिए शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य जीवन में एक बार बद्रीनाथ के दर्शन अवश्य करने चाहिए। बद्रीनाथ धाम दो पर्वतों के बीच में है इसे नर-नारायण भी पर्वत कहा जाता है। कहते हैं यहाँ पर भगवान विष्णु के अंश नर-नारायण ने कठोर तपस्या की थी। नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण हुए। मान्यता है कि जब केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं उस समय मंदिर में एक दीपक जलता रहता है। इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाजे के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं। 
भगवान विष्णु ने अपनी लीला द्वारा बद्रीनाथ अपनाया 
  • बद्रीनाथ कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है जिसमे भगवान विष्णु ने अपनी लीला द्वारा शिव और माता पार्वती के घर को अपना घर बना लिया था। जहाँ आज बद्रीनाथ का पवित्र मंदिर स्थित है वहां पहले भगवान शिव और माता पार्वती का घर होता था। एक बार नारद मुनि वैकुंठ धाम में भगवान विष्णु से मिलने गए तब उन्होंने देखा की भगवान विष्णु शेष नाग की शैया में विश्राम कर रहे है। उन्हें इस तरह लेटे देखकर नारद मुनि ने उन्हें नींद से जगाया और उनसे बोले-भगवन आप सम्पूर्ण मानवता के लिए बुरे प्रतीक बनते जा रहे हो हर समय आप इसी तरह विश्राम में रहते हो। माता लक्ष्मी सदैव आपकी सेवा में लगी रहती है और आप आलस में रहते हो। अगर आप इस तरह अपना समय व्यतीत करेंगे तो जगत के लिए आप अच्छे उदाहरण नहीं कहे जायेंगे। नारद मुनि की बात सुनकर भगवान विष्णु अपने इस समाधान के लिए हिमालय आये और तपस्या के लिए शांत एवं पवित्र स्थान ढूढ़ने लगे। स्थान ढूढ़ते-ढूढ़ते हुए भगवान विष्णु की नजर बद्रीनाथ पर पड़ी यह स्थान देखकर उन्हें बहुत पसंद आया। बद्रीनाथ वैसा ही स्थान था जैसा भगवान विष्णु को तपस्या के लिए चाहिए था। तभी भगवान विष्णु को वहाँ पर एक कुटियाँ दिखाई दी। जब वे उस कुटिया के दरवाजे के समीप गए तो अंदर उन्होंने माता पार्वती और भगवान शिव को पाया। भगवान विष्णु अपने मन में सोचने लगे की यह कुटिया तो भगवान शिव और माता पर्वती का घर है। यदि में इनके घर में घुसा तो बहुत ही भयानक होगा। भगवान शिव का क्रोध बहुत ही भयानक होता है। तभी भगवान विष्णु को एक विचार आया उन्होंने एक शिशु का रूप धारण कर लिया। शिशु का रूप धारण कर वे भगवान शिव के घर के दरवाजे के आगे लेट गए तथा जोर-जोर से रोने लगे। बच्चे की रोने की आवज सुनकर माता पार्वती के हृदय में माँ की ममता जाग गई। उन्होंने उस बालक को अपने गोद में ले लिया तब भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा इस बालक को मत छुओ परन्तु माता पार्वती भगवान शिव की बात न मानी। माता पार्वतीे कहने लगी की आप कितने निर्दयी हो।आप इस छोटे से शिशु को बाहर इस तरह रोते-बिलखते कैसे देख सकते हो ? माता पार्वती शिशु को घर के अन्दर ले आई और शिशु के सो जाने के बाद उसे घर में छोड़ माता पार्वती भगवान शिव के जैसे कुंड में स्नान करने चली गयी। जब वे दोनों वापस घर लोटे तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था। पार्वती आश्चर्यचकित रह गयी तब भगवान शिव ने उनसे कहा मैने तुम्हें कहा था इस बच्चे को मत उठाओ। अब उसने अंदर से घर का दरवाजा बंद कर लिया है। माता पार्वती भगवान शिव से बोली अब हम क्या करें? भगवान शिव के पास दो मार्ग थे पहला अपने सामने हर चीज को जला देना व दूसरा कही और चले जायें। भगवान शिव माता पार्वती से बोले चलो अब अन्य स्थान पर चलते है क्योकि में इस बालक का कुछ नहीं कर सकता यह तुम्हे प्रिय है। तब भगवान शिव और माता पार्वती ने अपना घर छोड़ दिया तथा दूसरा स्थान ढूढ़ते हुए केदारनाथ पहुँच गये और उसे उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया। तभी से बद्रीनाथ भगवान विष्णु के निवास स्थान के रूप में और केदारनाथ भगवान शिव के निवास स्थान के रूप में माना जाता है।
बद्रीनाथ जी की आरती
पवन मन्द सुगंध शीतल, हेम मंदिर शोभितम!
निकट गंगा बहत निर्मल, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम!!
शेष सुमिरन करत निशदिन, धरत ध्यान महेश्वरम!
श्री वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम!!
शक्ति गोरी गणेश शरद, नारद मुनि उच्चारंम!
योग ध्यान अपार लीला, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम!!
इंद्रा चंद्र कुबेर धुनि कर, धूप दीप प्रकाशीतम!
सीध मुनिजन करत जय जय, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम!!
यक्ष किन्नर करत वंदन, ज्ञान गंधर्व प्रकाशीतम!
श्री लक्ष्मी कमला चंवर डोल, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम!!
कैलाश मे एक देव निरंजन, शेल शिखर महेश्वरम!
राजा युधिष्ठिर करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम!!
श्री बद्रीनाथ जी के पंचरतन पढ़त पाप विनाशनम
कोटि तीरथ भवेत पुणयम, प्राप्यते फलदायकम्!!

pawan mandh sugandh sheetal, hem mandir sobhitam!
nikat ganga bahat nirmal, shri badrinarayan vishwambharam!!
sesh sumiran karat nishdin, dharat dhayan maheshwaram!
shri ved brahma karat stuti, shri badrinath vishwambharam!!
shakti gori ganesh sharad, naarad muni uccharanam!
yog dhyan apaar lila, shri badrinath vishwambharam!!
indra chandra kuber dhuni kar, dhup deep prakashitam!
sidh munijan karat jai jai, shri badrinath vishwambharam!!
yaksh kinnar karat vandan, gyaan gandharv prakashitam!
shri lakshmi kamla chavar dole, shri badrinath vishwambharam!!
kailash me ek dev niranjan, shel shikhar maheshwaram!
raja yudhisthir karat stuti, shri badrinath vishwambharam!!
shri badrinath ji ke panchratan padhat paap vinashanam!
koti tirath bhaveth punayam, prapayate phaldaykam!!